सोमवार, 4 फ़रवरी 2013


हिंदी विश्‍वविद्यालय में नज़ीर हाट का उदघाटन
 हिंदी समय कार्यक्रम के तीसरे दिन रविवार को सायं एक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार से रा यात्री ने विश्वविद्यालय में नवनिर्मित नज़ीर अकबराबादी हाट का उद्घाटन किया। इस हाट का नाम मशहूर शायर नजीर अकबराबादी के नाम पर रखा गया है। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता शेरजंग गर्ग ने की। इस अवसर पर मुख्‍य अतिथि के रूप में कुलपति विभूति नारायण राय उपस्थित थे। साहित्य विद्यापीठ के अध्‍यक्ष प्रो. के. के. सिंह के संचालन में एक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन हुआ जिसमें विजय किशोर मानव, अरविंद चतुर्वेद, मिथिलेश श्रीवास्‍तव, मुन्‍नी गंधर्व, हरप्रीत कौर, अमरेंन्‍द्र कुमार शर्मा, अर्चना त्रिपाठी, हुस्‍न तबस्‍सुम निहां, महेंद्र गगन, दिनेश कुमार शुक्ल, उपेंद्र कुमार, अनुज लुगुन, विपिन चौधरी, बलराम गुमास्ता, राकेश श्रीमाल, शशिभूषण सिंह, कुमार विरेन्‍द्र,सहित कई कवियों ने काव्य पाठ प्रस्तुत किया। इस अवसर पर प्रह्लाद अग्रवाल दंपत्ति ने नजीर अकबराबादी की गजलों को गाकर प्रस्तुत किया। 

भाषाई और सांस्‍कृतिक जकड़न से मुक्‍त हो नाटक

हम रंगमंच में पुरानी संरचना को तोड़ नहीं पा रहे है। कापीराइट ओर निर्देशन में हस्‍तक्षेप के कारण निदेशक की स्‍वतंत्रता खत्‍म हो रही है। नाटक भाषायी और सांस्‍कृतिक जकड़न में फंस गया है। इस जकड़न से मुक्ति पाने के लिए मुख्‍यधारा के नाटकों की आवश्‍यकता है। इस आशय के विचार विवि में नाटय कला एवं फिल्‍म अध्‍ययन विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. विधु खरे दास ने व्‍यक्‍त किये।
      महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में आयोजित हिंदी का दूसरा समय कार्यक्रम का चौथा दिन नाटकों पर समर्पित था। चौथा दिन नाटक, प्रतिरोध का सिनेमा, मुख्‍यधारा का नाटक, प्रतिरोध का नाटक और हिंदी प्रदेश में ललितकला आदि विषयों पर समर्पित था। स्‍वामी सहजानंद सरस्‍वती संग्रहालय में मुख्‍यधारा का नाटक विषय पर आयोजित सत्र में नाटय लेखिका डॉ. कुसुम कुमार, विश्‍वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर डॉ. विधु खरे दास आदि ने विचार रखे। सत्र की अध्‍यक्षता साहित्‍यकार खगेंद्र ठाकुर ने की। डॉ. खरे ने आगे कहा कि प्रयोग धर्मिता से ही रंगमंच बचा हुआ है। आज लेखक बड़ा या निदेशक इसपर जो बहस चल रही है इससे रंगमंच को नुकसान हो रहा है। हिंदी रंगमंच कुछ ही स्‍थानों पर केंद्रित हुआ है। जिससे उसका बहुआयामी विकास नहीं हो पा रहा है। रंगमंच के व्‍यापक विस्‍तार के लिए हिंदी पट्टी में भी उसका प्रसार हो और ऐसा केवल नाटकों के विकेंद्रीकरण से ही संभव हो पायेगा। महानगरों के साथ-साथ छोटे शहरों और गांवो, कस्‍बों में भी नाटक खेले जाने चाहिए।
      डॉ. कुसुम कुमार ने अपने नाटय लेखन के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि बदलते समय में नाटकों का भी रूप रंग बदल रहा है। हिंदी नाटकों के अभाव का जिक्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि हिंदी नाटकों का भंडार हमारे पास उपलब्‍ध नहीं है। जिस की गूंज देश में हो ऐसे नाटक हमारे पास होने चाहिए। उन्‍होंने कहा कि या तो नाटक लिखे कम जाते है और उसमें से भी खेले कम जाते है। नाटय लेखन में पुरुषों का दबदबा बना हुआ है। परंतु कुछ महिला लेखिकाएं इस परंपरा को तोड़ते हुए अपनी पहचान नाटय लेखन में बना रही है। इस क्रम में उन्‍होंने उषा गांगुली, मीरा कांत, त्रिपुरारी शर्मा आदि का जिक्र किया। एक दर्जन से भी अधिक नाटक लिखकर अड‍तीस वर्ष से भी ज्‍यादा नाटय लेखन की अनुभवी डॉ. कुसुम कुमार का मानना था की मुख्‍यधारा के नाटकों में श्रमिक, मजदुर और हाशिए के समाज का भी प्रतिनिधित्‍व होना चाहिए।
      अध्‍यक्षीय संबोधन में खगेंद्र ठाकुर ने कहा कि नाटककार की स्‍वतंत्रता भी बरकरार रहनी चाहिए। यदि निर्देशक स्‍वतंत्रता चाहता हैतो वह खुद भी नाटक लिख सकता है। उन्‍होंने यथार्थवादी नाटय लेखकों की परंपरा में भारतेंदु, जयशंकर प्रसाद आदि का जिक्र किया। सत्र का संचालन नाटय कला एवं फिल्‍म अध्‍ययन विभाग के डॉ. ओमप्रकाश भारती ने किया। इस दौरान सुविख्‍यात लेखक विकास नारायण राय, डॉ. सतीश पावडे, डॉ. प्रीति सागर, डॉ. चित्रामाली, बी. एस. मिरगे सहित छात्र-छात्राएं तथा शोधार्थी प्रमुखता से उपस्थित थे। 

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

मंचमुखी नहीं, जनोन्‍मुखी बने प्रिंट पत्रकारिता – अरविंद चतुर्वेद


हिंदी के वरिष्‍ठ पत्रकार और डीएनए के संपादक अरविंद चतुर्वेद ने कहा है कि हिंदी पत्रकारिता आज मंचमुखी है जबकि उसे जनोन्‍मुखी होना चाहिए। श्री चतुर्वेद आज रविवार को सआदत हसन मंटो कक्ष में हिंदी प्रिंट पत्रकारिता पर आयोजित संगोष्‍ठी को संबोधित कर रहे थे। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के ‘हिंदी का दूसरा समय’ के तीसरे दिन आयोजित इस संगोष्‍ठी में श्री चतुर्वेद का यह भी कहना था कि हिंदी पत्रकारिता को सहस्‍त्र बाजू की भूमिका में न आते हुए अपने भाषिक समाज के सरोकारों से जुड़ना चाहिए।  वरिष्‍ठ पत्रकार और कल्‍पतरू  एक्‍सप्रेस के संपादक अरूण कुमार त्रिपाठी ने बीज वक्‍तव्‍य देते हुए कहा कि पत्रकारिता को हाशिए के लोगों की जुबान बननी चाहिए। किसान, आदिवासी और ग्रामीण समाज के बुनियादी सवाल उठ़ाकर पत्रकारिता अपनी बेहतर भूमिका सुनिश्चित कर सकती है।
      लोकमत समाचार के संपादक विकास मिश्र ने कहा कि आज प्रिंट पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पत्रकारों की जो नई पीढ़ी आ रही है, वह योग्‍य नहीं है। पुरानी पीढ़ी के संपादकों ने अपने योग्‍य उत्‍तराधिकारी भी नहीं बनाए। आज नए पत्रकारों के पास भाषा का भी पर्याप्‍त ज्ञान नहीं है। वरिष्‍ठ पत्रकार सी. के. नायडू ने कहा कि आज हिंदी पत्रकारिता हिंग्‍लिश पत्रकारिता बन गई है। उन्‍होंने एक खबर पढ़कर इसका उदाहरण भी दिया। वरिष्‍ठ पत्रकार विजय किशोर मानव ने कहा कि चालीस साल पत्रकारिता करने के बाद उन्‍हें आज लगता है कि नई वेब पत्रकारिता की संभावना उनके सामने बनी हुई है। वरिष्‍ठ पत्रकार और आउटलुक के संपादक नीला‍भ मिश्र ने कहा कि आज पूंजी का दबाव हिंदी पत्रकारिता पर बहुत ज्‍यादा बढ़ गया है। उन्‍होंने कहा कि आज पत्रकारिता में भाषा के अलावा पेड न्‍यूज समेत कई विकृतियां आ गई हैं। सन्‍मार्ग के सहायक संपादक अभिज्ञात ने कहा कि अंग्रेजी अखबारों की पृष्‍ठ संख्‍या बहुत ज्‍यादा होती है और हिंदी अखबारों की कम पृष्‍ठ संख्‍या होती है। इसके बावजूद विज्ञापन का प्रवाह इसके उलट होता है। पत्रकारिता के अध्‍येता डॉ. श्‍याम कश्‍यप ने कहा कि विश्‍व कई संकटों से जूझ रहा है। पत्रकारिता का संकट उससे अलग नहीं है। वरिष्‍ठ पत्रकार प्रकाश चंद्रायण ने अपने आलेख में पत्रकारिता के इतिहास में झांकते हुए उसके स्‍वरूप में आए बदलावों की विस्‍तृत चर्चा की। कार्यक्रम का संचालन करते हुए विश्‍वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर तथा कोलकाता केंद्र के प्रभारी डॉ. कृपाशंकर चौबे ने कहा कि आज प्रिंट पत्रकारिता के सामने जो संकट हैं, उनकी पहचान यदि हम कर रहे हैं तो यही आश्‍वासन है कि हम उसका समाधान भी ढूंढ़ लेंगे। इस कार्यक्रम में विश्‍वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. जी गोपीनाथन, डॉ. के. एम. मालती, वरिष्‍ठ कथाकार से.रा. यात्री, प्रो. रामशरण जोशी, स्‍त्री अध्‍ययन विभाग के अध्‍यक्ष प्रो. शंभू गुप्‍त, सुशिला टाकभोरे, मधु कांकरिया, गौतम सान्‍याल, आशु सक्‍सेना, विश्‍वविद्यालय के विशेष कर्तव्‍य अधिकारी नरेंद्र सिंह, हिंदी अधिकारी राजेश यादव, जनसंपर्क अधिकारी बी. एस. मिरगे, वचन के संपादक तथा इलाहाबाद केंद्र के सहायक निदेशक प्रकाश त्रिपाठी समेत भारी संख्‍या में शोधार्थी और शिक्षक उपस्थित थे। 

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013


दलित साहित्‍य की हो रही है क्‍लोनिंग  –प्रो. तुलसीराम

हिंदी विश्‍वविद्यालय में दलित अभिव्‍यक्ति पर विमर्श


 महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में हिंदी समय के दूसरे दिन `दलित अभिव्‍यक्ति` सत्र में सुविख्‍यात चिंतक प्रो. तुलसीराम ने कहा कि दलित साहित्‍य में नेतृत्‍व का प्रश्‍न खड़ा हो गया है। भारतीय साहित्‍य में दलित साहित्‍य के प्रभाव को देखते हुए कुछ लोग दलित साहित्‍य की क्‍लोनिंग कर रहे हैं।
      प्रो. तुलसीराम ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और दलित साहित्‍य को अपने भाषण के केंद्र में रखते हुए कहा कि शिक्षित समाज की ही अभिव्‍यक्ति हो सकती है। ऐसा समाज अपना दुख, दर्द विभिन्‍न मंचों से व्‍यक्‍त कर सकता है। मजदूर और गरीबों पर कोई ध्‍यान नहीं देता क्‍योंकि वह अपने आपको  अभिव्‍यक्‍त नहीं कर सकता। समाज में स्‍थापित कुछ संगठन अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता को आघात पहुंचा रहे हैं। इसे कल्‍चरल पोलिस की संज्ञा देते हुए उन्‍होंने कहा कि ऐसी स्थिति में अभिव्‍यक्ति की आजादी का सवाल हमारे सामने बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है। आशीष नंदी प्रकरण का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि नंदी का बयान एकदम गलत है परंतु मुकदमें चलाकर ऐसे सवाल हल नहीं हो सकते। अच्‍छे साहित्‍य के लिए स्‍पर्धात्‍मक अभिव्‍यक्त्‍िा की जरूरत है। आत्‍मकथा और दलित साहित्‍य के संबंध को रेखांकित करते हुए उन्‍होंने कहा कि दलित आत्मकथा केवल दलित ही लिख सकता है। उन्‍होंने अपने वक्‍तव्‍य में आर्यों का भारत आना, गांधी आंबेडकर संबंध, आंबेडकर कालमार्क्‍स विमर्श आदि पर अपनी बात रखी। उन्‍होंने आंबेडकर साहित्‍य के अनुवादक चांगदेव खैरमोडे की पुस्‍तकों का उल्‍लेख करते हुए मेनिफेस्‍टो ऑफ शेडयुल कास्‍ट, लैंड नेशनलाईजेशन, लेबर पार्टी आदि की भी चर्चा की।
      कृष्‍णा किरवले ने महाराष्‍ट्र और दलित साहित्‍य का उल्‍लेख करते हुए कहा कि महाराष्‍ट्र में दलित साहित्‍य की चौथी पीढ़ी चल रही है। इन तमाम पीढ़ियों के लेखन में दलित साहित्‍य ही मुखर है। वर्तमान समय में दलित साहित्‍य को  सम्‍यक साहित्‍य, आंबेडकरी सम्मेलन, विद्रोही सम्मेलन, समतावादी सम्मेलन जैसे नाम दिये जा रहे हैं। यह साहित्‍य एक जाति का नहीं अपितु सभी जातियों का एक संयुक्‍त समूह है। उन्‍होंने कहा कि दलित लेखन को नकारना पूरे आंदोलन को  नकारने जैसा है। लिखने वालों की प्रेरणा आंबेडकर रहे हैं और यह साहित्‍य तलवार की बजाय लेखनी को हथियार मानता है। स्‍वामी सहजानंद सरस्‍वती संग्रहालय में दलित अभिव्‍यक्ति पर हुई बहस में जे. वी. पवार, जयप्रकाश कर्दम, कृष्‍णा किरवले, जयनंदन, प्रो. हेमलता माहेश्‍वर, डॉ. निशा शेंडे आदि वक्‍ताओं ने भी अपने विचार रखे।  सत्र का संचालन सहायक प्रोफेसर संदीप सपकाले ने किया। 

स्‍त्री विमर्श भारत की ही देन – प्रो. के. एम. मालती
स्‍त्री विमर्श की शुरूआत पश्चिम से नहीं बल्कि भारत में ही हुई है। यह विमर्श अब किसी प्रदेश विशेष में ही सीमित न रह कर देश के सुदूर क्षेत्र में पहुंच गया है। उक्‍त विचार प्रो. के. एम. मालती ने व्‍य‍क्‍त किये। वह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में चल रहे हिंदी का दूसरा समय के दूसरे दिन शनिवार को स्त्री अस्मिता पर  महादेवी वर्मा कक्ष में आयोजित चर्चा में सत्र की अध्यक्षता कर रही थी।
चर्चा में सहभागिता करते हुए विश्‍वविद्यालय के स्त्री अध्ययन की सहायक प्रोफेसर वासंती रमन ने कहा कि स्त्री की पहचान दूसरें की पहचान के साथ जुड़ी होती है चाहे वह जाति से हों या धर्म से। स्त्री-अध्ययन और महिला आंदोलन को जोड़ कर देखे तो उसके रास्ते और भी निकलेंगे। उन्होंने कहा कि महिला प्रश्न महिला आंदोलन स्त्री अध्ययन समाज के जनमानवीयकरण के लिए जरुरी है। इसी से हिंदी भाषाएं समाज एवं देश का विकास होगा। उन्‍होंने नामवर सिंह द्वारा स्‍त्री और दलितों के विषय में दिये गये विचार का समर्थन किया।
सुधा सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में महिलाओं के लेखन की चर्चा नहीं है। इसमें हमें यह भी याद रखना होगा कि गांधीजी के अहिंसा और सत्याग्रह आंदोलन में स्त्रियों का योगदान एक औजार की तरह था लेकिन 1950 के बाद स्त्रियों ने दंगों का दंश  भी झेला फिर आगे स्त्रियांघर की चारदीवारी में बंध कर रह गई। स्त्रियों को पूरी तरह सशक्त होने के लिए जनदबाव की आवश्‍यकता है। साथ ही उसे राजनीतिक संगठनों से जुड़ने की भी आवश्‍यकता है।
“शिकंजे का दर्द” की लेखिका सुशीला टाकभौरे ने कहा कि स्त्रियों का संरक्षण उसके लिए एक नियंत्रण की तरह है। दलित साहित्य के अस्तित्व पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह साहित्य सबसे पहले महाराष्ट्र में मराठी भाषा में आया। दलित स्त्री लेखन में चेतना और उत्पीड़न की बात होती है। वह पूरी तरह से जागृत रहती है, जबकि गैर-दलित महिला लेखन में ऐसा नहीं है। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि जिस धर्म में स्त्री की विड़ंबना होती है उस  असमानता के लेखन में परिवर्तन होना चाहिए, साथ ही विरोध भी जरुरी है। समाज की मानसिकता जातिवाद से नहीं बदली जा सकती बल्कि उन्हें खुद को बदलना होगा। अतंमें उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि ‘स्त्री स्वयं एक व्यक्ति है और वह जब स्वयं निर्णय ले तभी वह सबल हो सकती है।’
सुप्रिया पाठक कहा कि स्‍त्री अध्‍ययन पाठयक्रम महिलाओं को एक स्थान प्रदान करता है। जब तक सारे समाज को मिलाकर विचार नहीं करेंगे तब तक कोई भी विमर्श सत्यापित नहीं हो सकता। जैसे हिंदी के बीच से बोलियों को यदि निकाल दिया जाए भाषा ही नहीं बचेगी। उसी तरह स्त्री समाज की हर हिस्से से जुड़ी हुई है।
 सर्वेश जैन ने दलित महिला के न्याय की बात कहीं। उन्होंने कहा कि स्त्रियों के सशक्तीकरण के लिए पुरुषों की मानकिसता बदलने की जरुरत है।
इस दौरान छात्रों द्वारा उपस्थित किये गए प्रश्‍नों का उत्तर मंचास्‍थ वक्‍ताओं ने दिया। कार्यक्रम का संचालन तथा धन्यवाद ज्ञापन स्त्री अध्ययन विभाग के सहायक प्रोफेसर शरद जायसवाल ने किया।


चेतना से कलम का सिपाही बनना है- वरवर राव

       महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में आयोजित हिंदी के समय के दूसरे दिन अन्य जनांदोलन सत्र में विचारोत्तेजक बहस हुई। प्रख्यात चिंतक वरवर राव ने कहा कि समाज और व्यवस्था को बदलने के लिए आंदोलन होने चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में महिला, आदिवासी और विस्थापितों के आंदोलन चल रहे हैं। देश के कई हिस्सों में व्याप्त असमानता को भी बातचीत का विषय बनाया जाना चाहिए। आंध्र और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में काफी असमानता है। उन्होंने कहा कि आज हम नंदीग्राम, सिंगुर, या छत्तीसगढ़ में हो रहे विस्थापन पर बात नहीं करते। आज भी अस्पृश्यता और अछूत का दौर महाराष्ट्र में चल रहा है। राव ने लेखकों की भूमिका याद दिलाते हुए कहा कि हमारा ध्यान इस पर होना चाहिए कि हमें पूंजी का दास बनना है या चेतना से कलम का सिपाही बनना है। प्रगतिशील लेखक संघ की भूमिका आज समाप्त हो रही है जो कि चिंतनीय है। जनांदोलन से जुडे अरविंद अंजुम ने अपनी बात झारखंड के संदर्भ में रखी। उन्होंने कहा कि पहले हमारी धारणा थी कि विकास के लिए बलिदान जरूरी है। उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि जनांदोलन में विचारधारा का अभाव है और मुद्दे हावी हैं इसलिए जरूरी है कि इसका वैचारिक आधार पुख्ता किया जाए। नंदीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज ने कहा कि आज पूरे मीडिया में कहीं से भी एक संपादक नहीं कहता कि आप जनांदोलन पर लिखिए। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में संघर्षरत लोग कहते थे- ‘जान देबो जमीन देबो ना’ मैं ऐसे लोगों की बात लिखने वाला पत्रकार हूं। आप राजसत्ता के साथ रहना चाहते हैं या आम जनता के साथ यह खुद आपको तय करना होगा। उन्होंने कहा कि जन आंदोलन की पत्रकारिता होनी चाहिए और कलम के सिपाहियों की फौज खड़ी होनी चाहिए। युवा कथाकार सत्यानारायण पटेल ने कुछ अधिक तल्ख अंदाज में अपनी बात मध्य प्रदेश में हो रहे जन आंदोलनों के संदर्भ में रखी। उन्होंने कहा कि चकाचौंध दुनिया को एक अंधेरे भरी आबादी के गटर में धकेल रही है। इक्कीसवीं सदी का संघर्ष मनुष्यों और पशुओं के बीच है। प्रो. रमेश दीक्षित ने कहा कि अभिव्यक्ति की जो आजादी भारत में है वह किसी दूसरे देश में नहीं है। उन्होंने कहा कि परिवर्तन की संभावना संसदीय लोकतंत्र सबसे अधिक है और हमें उसका भरसक इस्तेमाल करना चाहिए। आज बाजारवादी शक्तियों का प्रतिरोध नहीं हो रहा है, जिसका प्रतिरोध किये जाने की ज्यादा जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत अमेरिकी पूंजीवाद का एजेंट नहीं है। कथाकार औऱ चिंतक प्रेमपाल शर्मा ने संक्षेप में कहा कि भारत में पिछले दो वर्षों में जन आंदोलनों के लिए कुछ जमीन तैयार हुई है और संभावना है कि यह सिलसिला आगे भी चलता रहेगा। आम जनता के लिए हरियाणा में साहित्य उपक्रम प्रकाशन के माध्यम से साहित्य के लिए माहौल बनाने वाले विकास नारायण राय ने कहा कि भाषा और साहित्य दो अलग-अलग चीजें हैं। उन्होंने कहा कि आज अच्छा साहित्य लिखा जा रहा लेकिन वह वह लाखों पाठकों तक नहीं पहुंच पा रहा है। उन्होंने कहा कि साहित्य में बहुत ताकत है बस जरूरत है उसको आम जनता तक पहुंचाने की। आलोचक खगेंद्र ठाकुर ने सत्र में हुई बहस पर अपनी टिप्पणी की। सभागार में कुलपति विभूति नारायण राय, कथाकार से.रा. यात्री, गंगा प्रसाद विमल, संजीव, शिवमूर्ति, जयप्रकाश धूमकेतु, अशोक मिश्र, प्रकाश त्रिपाठी, स्वाधीन, मनोज मोहन, प्रो.के के सिंह, अमरेंद्र कुमार शर्मा, सहित विश्वविद्यालय के शोधार्थी व छात्र बड़ी संख्या में उपस्थित थे। कायर्क्रम का सफल संचालन वरिष्ठ पत्रकार व चिंतक रामशरण जोशी ने किया। 

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013


आलोचना की प्रवृत्ति भी विकसित करनी होगी – नामवर सिंह

हम लोग आज कल हिसाब चुकता करने में लगे हैं। समालोचक आज अपना दायित्‍व भूल चुका है। वह किसी रचना की समालोचना ह्रदय से नहीं कर पा रहा है। समालोचक को खुद अपनी आलोचना भी करने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी। शुक्रवार को हिंदी के विख्‍यात आलोचक प्रो नामवर सिंह ने हिंदी का दूसरा समय के हिंदी आलोचना कार्यक्रम में संबोधन के दौरान ये बातें कहीं। हिंदी आलोचना के इस कार्यक्रम में देश भर के कई समालोचक जमा हुए थे।
समता भवन के रामचंद्र शुक्‍ल सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रख्‍यात आलोचक प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि आलोचक आज आतंक का पर्याय हो गया है। कोई रचनाकार भी अपनी रचना की आलोचना सुनना नहीं चाहता। यह आलोचना वह है, जो मंच से कृति की प्रशंसा करता है। उन्‍होंने कहा कि आलोचकों से सैद्धांतिकी के निर्माण की अपेक्षा करना गलत है। आलोचना को यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन यूजीसी के मानदंडों में भी नहीं बांधा जा सकता है। इसके नियमों का पालन करना आलोचकों का काम नहीं है। प्रो. जैन ने कहा कि देशी तत्‍व को छोड़कर आलोचना नहीं की जा सकती। पाठकों में रचना के प्रति जागृति पैदा करना भी आलोचकों का ही दायित्‍व है। रचना और आलोचना के बीच समय अंतराल जरूरी है।
     आलोचक खगेंद्र ठाकुकर ने कहा कि समाज में जनतंत्र के विकास के साथ लोकतंत्र का विकास जुड़ा है। किसी भी रचना का यथार्थ बाहर होता है। उसका सत्‍यापन आलोचक के लिए जरूरी है। आज की आलोचना कमजोर पड़ रही है। क्‍योंकि आलोचक सत्‍ता उन्‍मुख हो गए है। श्री ठाकुर ने कहा कि आलोचना और सत्‍ता एक साथ नहीं चल सकती। उन्‍होंने प्रेमचंद की रचना को सामने रखते हुए कहा कि उनकी तमाम रचनाओं के सामाजिक यथार्थ हैं। समाज की विसंगतियां उनकी रचनाओं में दिखती हैं।
     कवि‍ श्‍याम कश्‍यप ने अपने वक्‍तव्‍य में कहा कि आज संकट आलोचना का नहीं है, बल्कि आलोचकों का है। आलोचक अपने संकट को आलोचना का संकट बता देते हैं। जाने माने आलोचक एवं हिंदी विद्यापीठ के प्रो. सूरज पालीवाल ने इस बात को लेकर चिंता जताई कि आज हिंदी समालोचना का स्‍वरूप नहीं बन पा रहा है। कविता के नए प्रतिमान के बाद हिंदी आलोचना में घालमेल की स्थिति बन गई है। इस मौके पर राहूल सिंह, भारत भारद्वाज, अवधेश मिश्र, गौतम सान्‍याल और अखिलेश ने भी आलोचना को लेकर अपने-अपने विचार रखे। हिंदी आलोचना का संचालन प्रो शंभु गुप्‍त ने किया। विश्‍वविद्यालय के कई शो‍धार्थियों ने भी इसमें हिस्‍सा लिया।