रविवार, 7 अप्रैल 2013


फैकल्टी एण्ड ऑफीसर्स क्लब ने किया अतिथि लेखकों का स्वागत

कवि ऋतुराज, कवि -उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल तथा साठोत्तरी कथा पीढ़ी के प्रमुख स्तंभ दूधनाथ सिंह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के तीन नये अतिथि लेखक होंगे। प्रसिद्ध कथाकार व कथालोचक विजय मोहन सिंह तथा कथाकार संजीव का कार्याकाल समाप्त होने पर कुलपति विभूतिनायायण राय ने ये नियुक्तियां की हैं। शनिवार को फैकल्टी एण्ड ऑफीसर्स क्लब की ओर से नागार्जुन सराय अतिथि गृह के लॉन पर एक समारोह का आयोजन किया गया जिसमें विजय मोहन सिंह समेत तीनों अतिथि लेखकों का कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा सम्मान किया गया। इस समारोह में प्रतिकुलपति प्रो. ए. अरविंदाक्षन, कुलसचिव डॉ. कैलाश खामरे,वित्ताधिकारी संजय गवई समेत विभिन्न विद्यापीठों के अधिष्ठाता, अध्यापक एवं अधिकारी प्रमुखता से उपस्थित थे।
अतिथि लेखक के रूप में अपने एक वर्ष के कार्यकाल को रेखांकित करते हुए विजय मोहन सिंह ने विश्वविद्यालय परिवार के स्नेह, सहयोग और आत्मीयता के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्‍त की। उन्होंने कहा कि मैं यहां से बहुत कुछ लेकर जा रहा हूं। इस कार्यकाल को उन्होंने अपने जीवन का सर्वोत्तम काल कहा। इस अवसर पर नवनियुक्त  तीनों अतिथि लेखकों ने कुलपति राय को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में वर्धा में स्थापित इस विश्वविद्यालय को एक नई उंचाई पर लाकर खड़ा किया है। कुलपति राय ने सभी अतिथि लेखकों के स्वागत में कहा कि इन महान लेखकों की उपस्थिति से विश्वविद्यालय अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। इनका लाभ विश्वविद्यालय के छात्रों समेत अध्यापकों को भी मिलेगा। समारोह में प्रतिकुलपति प्रो. अरविंदाक्षन ने भी अपना वक्‍तव्‍य दिया। 

             
            अतिथि लेखक के रूप में विवि परिवार में शामिल ऋतुराज कविता के वाद-प्रतिवाद और तथाकथित गुटबंदी परक आंदोलनों से दूर सातवें दशक के एक विरल कवि हैं। कविता की प्रखर राजनैतिकता के दौर में उन्होंने अपनी काव्यभाषा के लिये एक नितांत निजी मुहावरा रचा और अँगीठी में सुलगती आग की तरह उनकी कविताएँ आज भी नये कवियों के लिए अपरिहार्य बनी हुई हैं।
दूसरे महत्वपूर्ण अतिथि लेखक विनोद कुमार शुक्ल ‘दीवार में खिड़की रहती थी’ के लिये साहित्य अकादमी से पुरस्कृत हैं । नौकर की कमीज, दीवार में खिड़की रहती थी और खिलेगा तो देखेंगे यह उनके तीन उपन्यास हैं जो भारतीय निम्न मध्यवर्ग का एक आधुनिक महाकाव्यात्मक शास्त्र प्रदर्शित करता है। एक और महत्वपूर्ण अतिथि लेखक दूधनाथ सिंह साठोत्तरी कथा पीढ़ी के तेजस्वी लेखकों में से है। कहानियों के अलावा निराला एवं महादेवी पर उनका आलोचनात्मक कार्य हिंदी साहित्य क्षेत्र में महानतम कार्य रहा है। ‘लौट आ ओ धार!’ यह संस्मरण और ‘यमगाथा’ यह नाटक भी उनकी रचनाओं में शामिल है। समारोह का संचालन अमरेन्द्र कुमार शर्मा ने किया।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013


महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से जुड़े   तीन नये अतिथि लेखक

कवि ऋतुराज, कवि -उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल तथा साठोत्तरी कथा पीढ़ी के प्रमुख स्तंभ दूधनाथ सिंह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के तीन नये अतिथि लेखक होंगे। प्रसिद्ध कथाकार व कथालोचक विजय मोहन सिंह तथा कथाकार संजीव का कार्याकाल समाप्त होने पर कुलपति विभूतिनायायण राय ने ये नियुक्तियां की हैं ।
                                कविता के वाद-प्रतिवाद और तथाकथित गुटबंदी परक आंदोलनों से दूर ऋतुराज सातवें दशक के एक विरल कवि हैं। कविता की प्रखर राजनैतिकता के दौर में उन्होंने अपनी काव्यभाषा के लिये एक नितांत निजी मुहावरा रचा और अँगीठी में सुलगती आग की तरह उनकी कविताएँ आज भी नये कवियों के लिए अपरिहार्य बनी हुई हैं।
           
अपने उपन्यास दीवार में खिड़की रहती थी के लिये साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कवि -उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल सही मायने में हिंदी के जीनियस रचनाकार हैं। नौकर की कमीज, दीवार में खिड़की रहती थी और खिलेगा तो देखेंगे नाम से उनके तीन उपन्यासों की त्रयी ने एक तरह से भारतीय निम्न मध्यवर्ग का एक आधुनिक महाकाव्यात्मक शास्त्र रचा है । शब्द और उनके अर्थो की विच्छिन्नता के इस दौर में उनकी कवितायें शब्दों में उनके अर्थों की वापसी का जीवन्त दस्तावेज हैं।
           
साठोत्तरी कथा पीढ़ी सर्वाधिक तेजस्वी लेखकों में से एक कथाकार दूधनाथ सिंह हिंदी के उन गिने चुने लेखको में  हैं जिनकी प्रतिभा एक विधा के दायरे में नही बंध सकी। अपनी प्रमुख पहचान कहानियों के अलावा निराला एवं महादेवी पर उनका आलोचनात्मक कार्य, लौट आ ओ धार! जैसा संस्मरण और यमगाथा जैसा नाटक हिंदी साहित्य की उपलब्धियां हैं ।
            हिंदी के इन विलक्षण रचनाकारों की एक साथ विश्वविद्यालय में उपस्थिति से परिसर का रचनात्मक वातावरण एक दस्तावेजी महत्व की तरह का होगा ,ऐसा भरोसा कुलपति ने जताया है।

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013


कुलपति श्री विभूति नारायण  राय को साहित्य शिरोमणि  सम्मान

हिंदी -उर्दू साहित्य अवार्ड कमेटी की ओर से 29 मार्च को उत्‍तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में  उप्र संगीत नाटक अकादमी प्रेक्षागृह में हुए 24वें अंतरराष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय , वर्धा के कुलपति श्री विभूति नारायण राय को साहित्य शिरोमणि सम्मान से नवाजा गया। उत्‍तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने अंगवस्त्र व स्मृति चिन्ह देकर श्री राय का सम्मान किया। इस अवसर पर राज्यपाल बीएल जोशी ने इस आयोजन को सराहनीय बताया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन हिंदी- उर्दू साहित्य के लोगों को एक ही मंच पर लाते हैं। राज्यपाल श्री बीएल जोशी ने साहित्य और साहित्यसेवियों का सम्मान किए जाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि साहित्य का सम्मान किए बिना समाज को संतुष्टि नहीं मिलती। साहित्य के सम्मान से समाज को दिशा मिलती है। साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल को ज्ञानपीठ दिए जाने के एक प्रसंग पर चर्चा करते हुए उन दिनों श्रीलाल जी का स्वास्थ्य खराब था, वे अस्पताल में भर्ती थे। इसे देखते हुए उन्होंने खुद समिति से जल्द से जल्द ज्ञानपीठ पुरस्कार सौंपने की बात कही। लखनऊ की बिगड़ती तहजीब को समृद्ध बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने भाषाई दृष्टि से होशियार रहने की बात कही। उन्होंने हिंदी-उर्दू को गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक बताया। इस अवसर पर हिंदी -उर्दू की अन्‍य विशिष्ट विभूतियों को भी सम्मानित किया गया। 

सोमवार, 1 अप्रैल 2013


पाठक ही साहित्यकार का आईनाः काशीनाथ सिंह

हिंदी के सुपरिचित साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने कहा है कि पाठक ही किसी लेखक का आईना होता है। डा. सिंह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र में आयोजित संवाद कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि पाठक ही लेखक को  कैरेक्टर सर्टिफिकेट देते हैं। उन्होंने कहा कि वे विश्वविद्यालय के बनाए लेखक नहीं हैं, अपितु पाठकों के बनाए लेखक हैं।
 महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र ने संवाद कार्यक्रम के पहले भारतीय भाषा परिषद के रचना समग्र पुरस्कार से सम्मानित होने के उपलक्ष्य में काशीनाथ सिंह की कृतियों पर कहासुनी कार्यक्रम का रखा था जिसमें काशीनाथ के उपन्यास ‘अपना मोर्चा’ पर रवि प्रकाश, ‘काशी का अस्सी’ पर हरिराम पांडेय, ‘रेहन पर रग्घू’ पर केके श्रीवास्तव, ‘महुआ चरित’ पर महेंद्र कुशवाहा, ‘घोआस’ नाटक पर डा. कामेश्वर सिंह,  ‘घर का जोगी जोगड़ा’ पर तारकेश्वर मिश्र ने आलेख पढ़े। वक्ताओं ने कहा कि काशीनाथ सिंह ने विधाओं को तोड़ा है और हर विधा की आलोचना के लिए रचनात्मक चुनौती खड़ी की है। काशीनाथ जी की कृतियों पर बीज वक्तव्य दिया कोलकाता केंद्र के प्रभारी डा. कृपाशंकर चौबे ने।
काशीनाथ सिंह की कृतियों पर आलेख पढे जाने के बाद लेखक से संवाद कार्यक्रम रखा गया जिसमें काशीनाथ सिंह ने कहा कि उन्हें विश्वविद्यालय ने लेखक नहीं बनाया, अपितु विश्वविद्यालय की चारदिवारी के बाहर की सड़कों, गांवों, बाजारों की भाषा व परिवेश ने बनाया। कार्यक्रम में काशीनाथ सिंह की कक्षा के छात्र रहे डा. प्रमथ नाथ मिश्र, समाजवादी चिंतक राजेंद्र राय, साहित्य के शोधार्थी प्रतीक सिंह तथा शिक्षा निकेतन के प्रिंसिपल मंगलेश्वर राय समेत भारी संख्या में अध्यापक, शोधार्थी व साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। कार्यक्रम की शुरुआत सुशील कांति के काव्य संगीत से हुई। कार्यक्रम का संचालन अभिजीत सिंह ने किया।

प्रगति के पथ पर हिंदी विश्‍वविद्यालय
 


गुरुवार, 28 मार्च 2013


हिंदी विवि में हर्बल होली की धूम

फगुआ  की लोक धुन पर थिरका विश्‍वविद्यालय परिवार

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के परिसर में पलाश के रंगों से होली मनाई गई। हर्बल रंगों से सराबोर लोगों ने गुलाल लगाकर एक-दूसरे को होली की शुभकामनाएं दीं। सुबह से ही लोग खास देसी अंदाज में ढ़ोल-बाजे के साथ फगुआ के लोकगीत में रम गए। कुलपति निवास में दिन भर ‘जोगीरा सा..रा..रा..’ के बोल में लोग थिरकते रहे।
सहायक प्रोफेसर धनजी प्रसाद व उनकी टोली द्वारा प्रस्‍तुत लोकगायन और सुर‍क्षा कर्मियों के ढ़ोलक की ताल पर कुलपति विभूति नारायण राय, प्रतिकुलपति प्रो.ए.अरविंदाक्षन, कुलसचिव डॉ.के.जी.खामरे, कुलानुशासक प्रो.सूरज पालीवाल, स्‍त्री अध्‍ययन के विभागाध्‍यक्ष प्रो.शंभू गुप्‍त भी थिरकने से अपने आपको नहीं रोक पाए।
     बिरसा मुण्‍डा छात्रावास, गोरख पांडेय छात्रावास, सावित्री बाई फुले महिला छात्रावास के विद्यार्थियों ने आकर्षक ढ़ंग से ढ़ोल बाजे के साथ केदारनाथ संकुल, शमशेर संकुल, अज्ञेय संकुल जाकर खूब मस्‍ती की। होली के आकर्षण के केंद्र में था- चीन, जापान, थाईलैण्‍ड आदि देशों के बच्‍चों का रंगोत्‍सव में शामिल होना।
भोजपुरी, अवधी, मगही, मैथिली, मराठी आदि बोली में फगुआ के कई गानों का लुफ्त उठाया गया। कुलपति विभूति नारायण राय ने रंगोत्‍सव की शुभकामना देते हुए कहा कि यह पर्व असत्‍य पर सत्‍य की विजय के लिए आनंद व उल्‍लास के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। रंग मात्र से होली नहीं होती, होली के साथ प्रेम का होना जरूरी है। हर्बल होली आपलोगों ने खेला, आप सभी को हमारी ढेर सारी शुभकामनाएं। विश्‍वविद्यालय के अध्‍यापकों, अधिकारियों, कर्मियों व विद्यार्थियों ने एक-दूसरे को होली की बधाई दी।

सोमवार, 25 मार्च 2013


हिंदी विश्‍वविद्यालय ने मनाया अर्थ आवर

पर्यावरण जागरूकता के लिए बिजली बंद कर निकाला कैंडिल मार्च

धरती और प्रकृति की खातिर महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में 23 मार्च (शनिवार) को रात्रि 8.30 से 9.30 बजे तक एक घंटे के लिए बिजली बंद कर ‘अर्थ आवर’ मनाया गया।
      आम जनों में ऊर्जा के इस्‍तेमाल व पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्‍य से विश्‍वविद्यालय के कुलसचिव डॉ.के.जी.खामरे, वित्‍ताधिकारी संजय भास्‍कर गवई, पर्यावरण क्‍लब के प्रभारी अनिर्वाण घोष की उपस्थिति में अधिकारियों, कर्मियों व विद्यार्थियों द्वारा कैंडिल मार्च निकाला गया। कैंडिल मार्च विश्‍वविद्यालय परिसर के केदारनाथ संकुल से शुरू हुआ। यह कैंडिल मार्च सावित्री बाई फुले महिला छात्रावास से होते हुए शमशेर संकुल, हॉस्‍पीटल, फिल्‍म एवं नाट्य अध्‍ययन विभाग, अज्ञेय संकुल, नागार्जुन सराय होते हुए नजीर हाट पर समाप्‍त हुआ। इस अवसर पर सभा को संबोधित करते हुए डॉ.के.जी.खामरे ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संरक्षण के लिए लोगों में दिलचस्‍पी को देखकर मैं बहुत उत्‍साहित हूँ। हम सभी को पूरे वर्ष अर्थ आवर के उद्देश्‍यों को आत्‍मसात करने की जरूरत है।
      इस दौरान पर्यावरण क्‍लब के प्रभारी अनिर्बाण घोष ने कहा कि वर्ल्‍ड वाइड फंड फॉर नेचर (डब्‍ल्‍यूडब्‍ल्‍यूएफ) द्वारा शुरू किए गए अर्थ आवर अभियान के तहत वर्ष 2007 में आस्‍ट्रेलिया के सिडनी शहर से इसकी शुरूआत हुई और अब दुनिया भर के 131 देशों के 4,000 से ज्‍यादा शहर इस आयोजन में हिस्‍सेदारी कर रहे हैं। हमारा विश्‍वविद्यालय पर्यावरण के प्रति अतिसंवेदनशील है। अगले वर्ष से वृहद् पैमाने पर अर्थ आवर मनाने का संकल्‍प लेते हुए उन्‍होंने कहा कि पर्यावरण संकट से जूझ रही दुनिया को बचाने की मुहिम में आप अपना महत्‍वपूर्ण योगदान दें, जिससे दुनिया बची रह सके। उन्‍होंने कुलपति विभूति नारायण राय, प्रतिकुलपति प्रो.ए.अरविंदाक्षन, विशेष कर्तव्‍याधिकारी नरेन्‍द्र सिंह, राष्‍ट्रीय सेवा योजना के प्रभारी डॉ.सतीश पावडे के प्रति आभार जताते हुए कहा कि हमें ये  पर्यावरण जागरूकता के लिए निरंतर प्रोत्‍साहित करते रहते हैं। अर्थ आवर मनाने के लिए भी इन्‍होंने हमें भरपूर सहयोग दिया।
      कैंडिल मार्च में विश्‍वविद्यालय के राष्‍ट्रीय सेवा योजना के सदस्‍यों ने खासी दिलचस्‍पी ली। कार्यक्रम के दौरान प्रो.शंभू गुप्‍त, डॉ.अनिल कुमार पांडेय, बी.एस.मिरगे, शैलेश मरजी कदम, शंभू जोशी, अमित विश्‍वास, डॉ.मिथिलेश, सत्‍यम सिंह, विनय भूषण, कमला थोकचोम देवी, चित्रलेखा अंशु, विनीत कुमार, राज राजेश्‍वर, भारती देवी, अनुपमा पांडेय सहित सैकड़ों कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी