शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

डॉ.दाभोलकर की हत्या विवेकवादी आंदोलन पर हमला

हिंदी विश्‍वविद्यालय के बुद्धिजीवियों ने की हत्‍या की भर्त्‍सना

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के लगभग पचास बुद्धिजीवियों ने महाराष्‍ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अग्रणी और मराठी साप्‍ताहिक साधना के संपादक डॉ.नरेन्‍द्र दाभोलकर की हत्‍या का निषेध किया है और विवेकवादी आंदोलन के प्रति सहभागिता प्रदर्शित की है।
इन बुद्धिजीवियों जारी हस्‍ताक्षरित वक्‍तव्‍य में कहा गया है कि डॉ.दाभोलकर की साजिशाना हत्‍या से जाहि़र होता है कि देश में अंधश्रद्धा, धर्मांधता, अंधराष्‍ट्रवाद, सांप्रदायिक राष्‍ट्रवाद और अंधअर्थवाद का खतरनाक गठजोड़ कायम हो र‍हा है। निहित स्‍वार्थी तत्‍व विवेकवादी आवाजों को दबाने में तत्‍पर हैं। इसके खिलाफ कानून को अपना कर्तव्‍य तत्‍तरता से अंजाम देना चाहिए तभी अंधश्रद्धामूलक और धर्मांध शक्तियों को रोका जा सकेगा। वक्‍तव्‍य में यह भी कहा गया है कि इन ताकतों के खिलाफ राजसत्‍ता लगभग निष्किय है जो भावी पीढि़यों को अघोषित मानसिक दासता की गिरफ़्त में लेना चाहती हैं। डॉ.दाभोलकर की शहादत विवेकवादी आंदोलन को तेज करने का संदेश दे रही है। हम इस संदेश के सहभागी हैं।

वक्‍तव्‍य पर विश्‍वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय, चार प्रख्‍यात आवासीय लेखकों दूधनाथ सिंह, ऋतुराज, विनोद कुमार शुक्‍ल और संजीव के अलावा प्रो.मनोज कुमार, प्रो.रामशरण जोशी, प्रो.सूरज पालीवाल, प्रो.के.के.सिंह, प्रो.सुरेश शर्मा, प्रो.वासंती रमण, प्रकाश चन्‍द्रायन, डॉ.फरहद मलिक, डॉ.एम.एम.मंगोड़ी, डॉ.जयप्रकाश धूमकेतु’, डॉ.ओ.पी.भारती, अशोक मिश्र, डॉ.रवीन्‍द्र बोरकर, अमित राय, संदीप सपकाळे, सुप्रिया पाठक, डॉ.सुरजीत कु.सिंह, डॉ.राजीव रंजन राय, डॉ.सतीश पावड़े, राकेश श्रीमाल, डॉ.अमित विश्‍वास, डॉ.सत्‍यम सिंह, डॉ.रयाज हसन, हरप्रीत कौर, अनामी शरण बबल सहित पचास बुद्धिजीवियों के हस्‍ताक्षर हैं। 

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

हिंदी विवि में पद्मश्री केशव मलिक का व्याख्यान

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के नाटय कला एवं फिल्‍म अध्‍ययन विभाग द्वारा कला की अप्रासंगिकता विषय पर व्‍याख्‍यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम अध्‍यक्षता कुलपति विभूति नारायण राय ने की। व्‍याख्‍यान में प्रसिद्ध कवी, कला समीक्षक पद्मश्री केशव मलिक ने कहा कि कलाकार को संवेदनशील होना चाहिए। कला को संवेदना से अलग नहीं किया जा सकता कलाकार की आत्‍मशुद्धी एक अनिवार्य प्रक्रिया है। कला आपको अध्‍यात्‍म की ओर ले जाती है। अत: कलाकार को अपनी संवेदनाओं को आध्‍यात्‍म की ओर ले जाना चाहिए। इससे मनुष्‍य जन्‍म की सार्थकता प्राप्‍त होगी। हर समय नया या ओरीजिनल निर्माण करना, या करने की सोचना यह मात्र एक भ्रम होता है। अत: कार्य एवं प्रक्रिया पर ही कलाकार ने ध्‍यान देना चाहिए। इस प्रक्रिया को आत्‍मशुद्धी की प्रक्रिया बनाना चाहिए। अध्‍यात्‍म के सिवाय कला एक कारीगरी हो सकती है। उससे कलाकार कारीगर बन सकता है कलाकार नहीं। 
कार्यक्रम का प्रास्‍ताविक डॉ. सतीश पावडे तथा अतिथियों का परिचय डॉ. विधु खरे दास ने किया। इस अवसर पर प्रो. निर्मला जैन, शरद कुमार, प्रो. सुरज पालीवाल, प्रो. के. के. सिंह, डॉ. प्रीति सागर, डॉ. अशोक नाथ त्रिपाठी, डॉ. बिरपाल सिंह, डॉ. रामानुज अस्‍थाना, डॉ. अनवर अहमद सिद्दीकी, डॉ. अमेश कुमार सिंह सहित छात्र-छात्राएं बड़ी  संख्‍या में उपस्थित थे। 

सोमवार, 19 अगस्त 2013

कोलकाता केंद्र में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी

नई पीढ़ी ने शाहबाग आंदोलन को जिंदा रखाः अंजन राय

अंजन राय का पुष्पगुच्छ देकर सम्मान करते राजेंद्र राय। साथ में डा. कृपाशंकर चौबे।
बांग्लादेश के वरिष्ठ पत्रकार अंजन राय ने कहा है कि नई पीढ़ी पर यह आरोप गलत है कि वह फेसबुक और मोबाइल में ही व्यस्त रहती है और कमर के नीचे खिलकाकर पैंट पहनकर फैशन का फूहड़ प्रदर्शन कर रही है। सही तो यह है कि यही नई पीढ़ी जनांदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है। श्री राय ने कहा कि बांग्लादेश में शाहबाग के जनांदोलन को वहां के किशोरों ने ही न सिर्फ जीवित रखा, बल्कि उसे फैलाया भी। श्री राय महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र में जनांदोलन और नई पीढ़ी विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। श्री राय ने कहा कि उस पार 1952 में भाषा को लेकर जनांदोलन हुआ था जिसकी परिणति मुक्ति संग्राम के रूप में हुई। उस संग्राम में भारत की उल्लेखनीय भूमिका रही। मुक्ति संग्राम के योद्धाओं को मारनेवालों को दंडित करने की मांग को लेकर शाहबाग में आंदोलन शुरू हुआ जो बांग्लादेश के हर जिले में फैल गया। उन्होंने कहा कि जनांदोलनकर उस पार के लोगों ने जो हासिल किया, वह इस पार के बंगाल के लोग हासिल नहीं कर पाए।

संगोष्ठी को बांग्ला पत्रकार सुकुमार मित्र, अरुप रक्षित, एके भट्टाचार्य, अविरंजन कर, शिवब्रत बसु, राजीव विश्वास और पीयूसीएल के नेता हरेराम चौबे ने भी संबोधित किया और जोर देकर कहा कि बंगाल के लोग शाहबाग के साथ जनांदोलन के साथ हैं। संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रसिद्ध समाजवादी राजेंद्र राय ने की। संचालन महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र के प्रभारी डा. कृपाशंकर चौबे ने किया। आरंभ में विश्वविद्यालय की तरफ से अंजन राय का सम्मान किया गया।

रविवार, 18 अगस्त 2013

हिंदी विश्वविद्यालय में मनाया गया स्वतंत्रता दिवस

शक्तिशाली देश बनकर उभर रहा है भारत -विभूति नारायण राय


आज हमारा देश निरंतर कड़ी मेहनत और लगन से काम करने के कारण विश्व का एक शक्तिशाली और प्रतिभाशाली देश बनकर उभर रहा है। हमें देश के विकास के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। उक्‍त प्रतिपादन आजादी की 67 वीं वर्षगांठ के मौके पर महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विश्‍वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने किए।
उन्‍होंने विश्‍वविद्यालय के मुख्‍य प्रशासनिक भवन के प्रांगण में तिरंगा फहराया। कुलपति राय ने विश्वविद्यालय परिवार के सभी शिक्षकों, कर्मचारियों एवं छात्र-छात्राओं को स्वतंत्रता दिवस की बधाई दी। उन्‍होंने छात्रों को खुशखबरी देते हुए बताया कि अगले सत्र से विश्वविद्यालय में डी.एड., बी.एड. और एम. एड. के पाठ्यक्रम शुरू हो जाएंगे। कुलपति राय ने बताया कि हाल ही में विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग ने शिक्षा विद्यापीठ शुरू करने के संदर्भ में अनुमति दे दी है। शिक्षा विद्यापीठ के भवन निर्माण की तैयारी शुरू हो गयी है और अगले सत्र से यह विद्यापीठ कार्यरत हो जाएगा साथही शिक्षकों की भर्ती कर ली जाएगी। इन पाठ्यक्रमों की कक्षाएं अगले साल से संचालित होने लगेंगी। इस अवसर पर कुलपति राय ने ने विश्वविद्यालय के सुरक्षा कर्मियों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रमाणपत्र प्रदान कर पुरस्कृत किया। 

भवनों का उदघाटन और शिलान्यास

स्वतंत्रता दिवस के इस अवसर पर विश्वविद्यालय में कई भवनों का उदघाटन और शिलान्यास किया गया। गजानन माधव मुक्तिबोध के तीन पुत्रों रमेश, दिवाकर और  दिलीप मुक्बिोध की उपस्थिति में गजानन माधव मुक्तिबोध भवन का उदघाटन प्रखर हिन्दी आलोचक प्रो. निर्मला जैन ने फीता काट कर किया।
दूर शिक्षा निदेशालय भवन और अकादमिक भवन का शिलान्यास केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियन्ता डॉ के. एम. सोनी ने कुलपति की अध्यक्षता में फीता काट कर किया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय में आए सभी अतिथियों ने महापंडित राहुल सांकृत्यायन केन्द्रीय पुस्तकालय और स्वामी सहजानंद सरस्वती संग्रहालय का निरीक्षण किया तथा इससे अभिभूत होकर कुलपति को धन्यवाद ज्ञापित किया।   
कुलपति राय ने की वृक्षारोपण अभियान की शुरूआत
विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर में कुलपति ने वृक्षारोपण कर इस अभियान की शुरूआत की। इस मौके पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ कैलाश खामरे, कुलानुशासक प्रो. सूरज पालीवाल, विशेष कर्तव्य अधिकारी नरेन्द्र सिंह, परिसर विकास के राजेश्वर सिंह, राजीव पाठक, तुषार वानखेड़े, पर्यावरण क्लब के संयोजक अनिर्वाण घोष, पर्यावरण क्लब के सदस्य असिस्टेन्ट प्रोफेसर धरवेश कठेरिया, सुरक्षा अधिकारी राजेश घोड़मारे, राष्ट्रीय सेवा योजना के संयोजक सतीश पावडेअसि. प्रो. रवि कुमार, जनसंपर्क अधिकारी बीएस मिरगे, बिरसामुंडा छात्रावास व गोरख पांडे छात्रावास के केयर टेकर मनोज कुमार व सचिन यादव सहित भारी संख्या में छात्र -छात्राएं मौजूद रहे।  
उत्तरी परिसर में बनेगा भगत सिंह पार्क
विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर में वृक्षारोपण के दौरान राष्ट्रीय सेवा योजना के संयोजक सतीश पावडे ने कुलपति के समक्ष एक हरा-भरा पार्क बनाने का प्रस्ताव रखा। कुलपति ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर उत्तरी परिसर में भगत सिंह के नाम पर पार्क बनाने के लिए जमीन तथा राशि देने का आश्वासन दिया।
   
साहित्यक धरोहर और संरक्षण विषय पर आयोजित हुआ व्याख्यान
विश्‍वविद्यालय में स्वामी सहजानंद सरस्वती संग्रहालय के तत्वाधान में हबीब तनवीर सभागार में साहित्यक धरोहर और उसके संरक्षण को लेकर एक व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति विभूति नारायण राय ने की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में हिंदी साहित्य की प्रखर आलोचक निर्मला जैन उपस्थित थी। इस अवसर पर विश्वविद्यालय में कवि एवं साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध के तीन पुत्रों रमेश, दिवाकर और दिलीप मुक्तिबोध एक साथ नजर आए।
    अध्यक्षीय उदबोधन में कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि यह संग्रहालय हिंदी विश्वविद्यालय की एक नई पहचान के रूप में उभर रहा है। इसमें प्राचीनकाल के कवियों की कृतियों और दुर्लभ पाण्डुलिपियों को रखा गया है जिनका किसी दूसरी जगह पर मिलना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि संग्रहालय में रखी वस्तुओं को देखकर किसी देश की संस्कृति और सभ्यता को समझा जा सकता है। साथ ही कुलपति ने बताया कि विश्वविद्यालय में गांधी हिल के पास लगभग 12 करोड़ रूपए की लागत से एक नया संग्रहालय बनाया जा रहा है। जो विश्वविद्यालय का बड़ा और अद्वितीय संग्रहालय होगा जिसको वर्धा में आने वाले सभी पर्यटकों के लिए खोला जाएगा। उन्‍होंने कहा कि इस संग्रहालय में कला, संगीत, संस्‍कृति, साहित्‍य एवं नृत्‍य की अलग-अलग दीर्घाएं होंगी।
     कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि विश्‍वविद्यालय के संग्रहालय में आज जिस तरह से प्राचीन लेखकों की रचनाएं एवं पाण्डुलिपियां आ रही हैं यह एक सराहनीय पहल है। उन्‍होंने कहा कि संग्रहालय को चलाने और इसकी रक्षा करने की जिम्मेदारी विश्वविद्यालय के शिक्षकों की हैं। उन्होंने कहा कि हमें संग्रहालय का महत्व तब पता चलता है जब वे संग्रहालय में जाकर प्राचीन वस्तुओं को पढ़ते और देखते है। संग्रहालय हमें इतिहास के बारे में ज्ञान देता है।
    
संग्रहालय के प्रभारी तथा अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. देवराज ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। कथाकार प्रो. दूधनाथ सिंह ने गजानन माधव मुक्तिबोध को लम्बी कविताओं का जनक और अनुगमनीय कवि बताया। हिंदी साहित्य के अधिष्ठाता प्रो. सूरज पालीवाल ने संग्रहालय की आवश्यक्ता और उसके संरक्षण विषय पर बोलते हुए कहा कि ये संग्रहालय विश्वविद्यालय की एक बड़ी विरासत है।उन्होंने बताया कि आज हमारे बीच इस संग्रहालय में कई तरह की प्राचीन पाण्डुलिपियां और विभिन्न सभ्यताओं से जुडी वस्तुएं मौजूद हैं। इस दौरान कवि विनोद कुमार शुक्‍ल ने मुक्तिबोध से जुड़े संस्‍मरण सुनाएं। वहीं केशव मलिक ने सत्‍यवती मलिक के जीवन के अनुछुए पहलुओं पर प्रकाश ड़ाला। आवासीय लेखक ऋतुराज, प्रो. सुरेश शर्मा, प्रो. के. के. सिंह, डॉ. रामानुज अस्‍थाना आदि ने संग्रहालय के भविष्‍य की रूपरेखा और विकास के बारे में अपनी भावनाएं व्‍यक्‍त की। कार्यक्रम का संचालन साहित्‍य विभाग की एसोसिएट  प्रो. डॉ प्रीति सागर ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम के संयोजक संग्रहालय में कार्यरत व्याकरण अनुषंगी डॉ श्रीरमण मिश्र ने किया। कार्यक्रम में अध्‍यापक, अधिकारी एवं छात्र-छात्राएं बड़ी संख्‍या में मौजूद रहे।               

साहित्यकारों ने सौंपी पाण्डुलिपियां व रचनाएं

इस समारोह में साहित्यकारों ने स्वामी सहजानंद सरस्वती संग्रहालय के विकास के लिए विभिन्न साहित्यकारों की पाण्डुलिपियां और उनसे संबंधित अन्य सामग्री कुलपति विभूति नारायण राय को सौंपी। रमेश मुक्तिबोध द्वारा मुक्तिबोध की पाण्‍डुलिपियां, प्रो. दूधनाथ सिंह ने भैरव प्रसाद की पाण्डुलिपियां, कला समीक्षक व बलराज साहनी के भांजे केशव मलिक ने सत्यवती मलिक की पाण्डुलिपियां, डॉ. रामानुज अस्थाना ने प्रो. रमेशकुंतल मेघ की रचनाएं तथा परिमल प्रियदर्शी ने विजेन्द्र नारायण सिंह की पाण्डुलिपियां वा उनसे संबंधित  सामग्री कुलपति राय को सौंपी।

जनजातीय संग्रहालय का उदघाटन

      महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में मानवविज्ञान विभाग द्वारा संचालित जनजातीय संग्रहालय का उदघाटन समता भवन में कुलपति विभूति नारायण राय ने स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर किया। विदित हो कि विश्‍वविद्यालय स्थित यह संग्रहालय अपने आप में अनूठा है। संग्रहालय भारत की जन‍जातियों की संस्‍कृति पर प्रकाश डालता है। संग्रहालय में 20 से भी ज्‍यादा मध्‍य एवं उत्‍तर भारत के जनजातियों की शिकार, कृषि, वेष-भूषा, घरेलू इत्‍यादि से संबंधित सामग्रियों का संग्रह है।
उदघाटन के अवसर पर कुलपति राय ने मानवविज्ञान विभाग के शिक्षकों एवं छात्रों की प्रशंसा करते हुए कहा कि बिना किसी आर्थिक सहायता के जनजातीय सामग्रियों को एकत्रित किया। उन्‍होंने बताया कि वर्धा लगभग भारत के मध्‍य में है। यदि हम 250 कि. मी. के आसपास के अंतर को रेखांकित करते है तो भारत भी लगभग 30 प्रतिशत आबादी इसी क्षेत्र में निवास करती है।
संग्रहालय के अनूठेपण के बारे में जनजातीय संग्रहालय के प्रभारी डॉ. वीरेन्‍द्र प्रताप यादव ने बताया कि वर्तमान समय में भारत में अनुसूचित जनजातियों की आबादी लगभग साढ़े आठ करोड़ है। जिसमें से आधी से ज्‍यादा जनजातीय जनसंख्‍या मध्‍य भारत में निवास करती है। यह हमारी खुशकिस्‍मती मे है कि हमारा विश्‍वविद्यालय मध्‍य भारत में है और इसके साथ यह हमारी जिम्‍मेदारी भी है कि मध्‍य भारत में निवास करने वाली जनजातियों की बहुमूल्‍य एवं अद्वितीय संस्‍कृति का हम संरक्षण करें तथा इसका ज्ञान छात्रों, अनुसंधानकर्ताओं तथा आम जनता तक बढ़ाये।
     मानवविज्ञान विभाग के अध्‍यक्ष डॉ. फरहद मलिक ने बताया कि संग्रहालय में प्रदर्शित सभी सामग्रियों को मानवविज्ञान विभाग के छात्रों तथा शोधार्थियों द्वारा क्षेत्र कार्य के दौरान संग्रहित किया गया है। क्षेत्रकार्य मानवविज्ञान के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्‍सा है।
     उदघाटन समारोह में कुलसचिव डॉ. कैलाश खामरे, कुलानुशासक प्रो. सूरज पालीवाल, आवासीय लेखक ऋतुराज, दूधनाथ सिंह तथा विनोद कुमार शुक्‍ल, सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो. निर्मला जैन, प्रो. मनोजकुमार, प्रो. के. के. सिंह, प्रो. बी. एम. मुखर्जी, प्रो. अनिल के. राय, प्रो. देवराज, डॉ. नृपेन्‍द्र प्रसाद मोदी, विशेष कर्तव्‍य अधिकारी नरेंद्र सिंह, डॉ. राजीव रंजन राय, अनुसंधान अधिकारी आशुतोष कुमार एवं डॉ. परिमल प्रियदर्शी, डॉ. वीर पाल सिंह यादव, डॉ. राम प्रकाश यादव, बी. एस. मिरगे, राजेश लेहकपुरे सहित के छात्र एवं कर्मचारी बड़ी संख्‍या में उपस्थित थे। 

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

श्री विभूति नारायण राय को हिमालय अंतरराष्ट्रीय साहित्य सृजन सम्मान

                        हिमालय अंतरराष्ट्रीय महोत्सव 2013

हिमालय अंतरराष्ट्रीय महोत्सव के तीसरे दिन आज सिक्किम गवरमेंट कॉलेज के प्रेक्षागृह में सिक्किम पर्यटन मंत्री श्री भीम प्रसाद धुंगेल ने सांस्कृतिक कार्यक्रम का उदघाटन किया। इस अवसर पर सिक्किम विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो॰ टी॰ डी॰ सुब्बा, सिक्किम कॉलेज के प्राचार्य डॉ॰ एम॰ पी॰ खरेल तथा पद्मश्री सोनम छिरिंग लेप्चा आदि उपस्थित थे।
माननीय मंत्री श्री भीम प्रसाद धुंगेल ने हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए प्रख्यात साहित्यकार तथा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति  श्री विभूति नाराय राय को हिमालय अंतरराष्ट्रीय साहित्य सृजन सम्मान प्रदान किया। जबकि नेपाली साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए माननीय कुलपति प्रो॰ टी॰ डी॰ सुब्बा ने श्री शंकर देव ढकाल को हिमालय अंतरराष्ट्रीय साहित्य सृजन सम्मान से सम्मानित किया।
उदघाटन वक्तव्य में माननीय पर्यटन मंत्री ने कहा वर्तमान समय में हिमालय के पर्यावरण तथा संस्कृति को बचाना भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व समाज के लिए चुनौती है। हिमालय केवल एक पर्वत नहीं संस्कृति का संवाहक है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रथम प्रस्तुति नेपाल के गंधर्व द्वारा गायने गीत से हुई तत्पश्चात तिब्बत के ग्रुप तेंजिंग दोनियो ने तिब्बत का पारंपरिक गीत, सिक्किम के लिम्बू ग्रुप, नटराज कला केंद्र द्वारा कत्थक नृत्य, सायरी द्वारा लेपचा पारंपरिक नृत्य, भुटान के पारो द्वारा भुटिया डांस, गंगा मुखिया द्वारा नेपाली लोकगीत, सिक्किम विश्वविद्यालया के छात्रों तथा नटराज कला केंद्र द्वारा नेपाली पारंपरिक नृत्य, सिक्किम के सोम्ब्रे ग्रुप द्वारा चेबरुंग नृत्य, सिक्किम विश्वविद्यालय के छात्र पार्थो द्वारा बांसुरी वादन, सिक्किम गवरमेंट कॉलेज द्वारा नेपाली लोकगीत जैसे एक के बाद एक प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सांस्कृतिक कार्यक्रम के मध्य श्री विभूति नाराय राय तथा श्री शंकर देव ढकाल को हिमालय अंतरराष्ट्रीय साहित्य सृजन सम्मान से सम्मानित किया। विभूति नारायण राय जी ने सम्मान के लिए संस्था का आभार व्यक्त किया साथ ही सिक्किम की सांस्कृतिक परंपरा को विशिष्ट बताया। श्री शंकर देव ढकाल जी ने सम्मान के लिए संस्था का आभार व्यक्त किया। उन्होने कहा हिमालय की पहचान उसकी अपनी अद्भुत सांस्कृतिक परंपरा से है जिसे बचाए जाने के संस्था द्वारा किए जाने वाले पर्यासों की उन्होने सराहना की।
      हिमालय के पारंपरिक परिधानों को लेकर प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिसमें हिमालय के विभिन्न समुदायों के पारंपरिक परिधानों को प्रस्तुत किया गया। इन परिधानों के माध्यम से हिमालय की परंपरागत संस्कृति को दर्शकों से रूबरू कराना इस प्रतियोगिता का मुख्य उद्देश्य है।           
      अतिथियों का स्वागत एच॰एच॰आर॰डी॰एस॰ (हिमालय हेरिटेज, रिसर्च डेवलोपमेंट सोसाइटी) के अध्यक्ष  तथा महोत्सव के परिकल्पक ( डॉ॰ ओमप्रकाश भारती) ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन उपाध्यक्ष जयंत कुमार बर्मन ने किया। कार्यक्रम की उद्घोषणा पारसमणी दंगाल ने की तथा संचालन डॉ॰ महेन्द्र कुमार, समीर मित्र, कैलाश जीवानी, कुमार गौरव मिश्रा, धर्मप्रकाश मंटो, भोला दयाल, रवीन्द्र कुमार मुंढे, अभिषेक त्रिपाठी, सुषमा पाण्डेय, डॉ॰ अनुजा सुप्रिया, शताब्दी बर्मन आदि ने किया।

      दिनांक 9 अगस्त को सिक्किम विश्वविद्यालय के प्रेक्षागृह में “हिमालय की सांस्कृतिक परंपरा तथा देशज ज्ञान” विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई है। संगोष्ठी में भुटान, नेपाल, तिब्बत, उत्तर बंगाल, सिक्किम, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि के ख्यातिलब्ध विद्वान तथा शोधार्थीयों ने अपने पत्र प्रस्तुत किए।              

रविवार, 4 अगस्त 2013

हिंदी विश्वविद्यालय में ममता कालिया का कहानी पाठ

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के नागार्जुन सराय स्थित फैकल्‍टी एण्‍ड ऑफिसर्स क्‍लब में कहानीकार ममता कालिया के कहानी पाठ का आयोजन आखर अद्यतन के तत्‍वावधान में किया गया। समारोह की अध्‍यक्षता प्रसिद्ध आलोचक प्रो. निर्मला जैन ने की। इस अवसर पर कुलपति विभूति नारायण राय मुख्‍य अतिथि के रूप में उ‍पस्थित थे। अध्‍यक्षीय उदबोधन में प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि राजनीति व पैसे की कश्‍मकश के बीच का समाज ममता कालिया की कहानी में आता है। यह कहानी युवाओं सहित सभी को सोचने पर मजबूर करती है। समाज में जब तक बैचेनी है तब तक मूल्‍य भी हैं। यदि बैचेनी नहीं बचेगी तो समाज का पतन होने का डर रहेगा। कुलपति विभूति नारायण राय ने ममता कालिया की कहानी पर अपना मंतव्‍य व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि ममता की कहानी सधी हुई व कुशल भाषा में लिखी गई है। कहानी में जिन पात्रों का उल्‍लेख हुआ है उनमें से कुछ-एक के साथ तो हमारा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सामना भी हुआ है।
ममता कालिया के कहानी पाठ के पश्‍चात कई अन्‍य लोगों ने भी अपनी टिप्‍पणियां प्रस्‍तुत की जिनमें हिंदी के वरिष्‍ठ कथाकार दूधनाथ सिंह ने कहानी पर टिप्‍पणी करते हुए कहा कि कालिया की कहानी विवरण से घनत्‍व की ओर जाती हैं। विस्‍तार और घनत्‍व का अंतर्सबंध कहानी में प्रदर्शित होता है। पत्रकार राजकिशोर ने कहा कि कहानीकार की भाषा और हर समाज की पीढ़ा में अंतर है। इस अंतर को अपनी भाषा में कालिया ने परिभाषित किया है। कहानी में प्रेमचंद की शैली का अनुसरण ही है। साहित्‍य विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता तथा समीक्षक प्रो.सूरज पालीवाल ने कहा कि कालिया के कहानी में परिवार का विघटन और छलावा प्रदर्शित होता है। उनकी कहानी टूटते हुए परिवार की दासतां है। युवा कहानीकार राकेश मिश्र ने कहानी को आस्‍वाद के स्‍तर पर बिना घालमेल व भाषिक प्रयोग की कहानी कहा। कार्यक्रम का संचालन आखर अद्यतन के संयोजक सहायक प्रोफेसर रूपेश कुमार सिंह ने किया। इस अवसर पर दैनिक भास्‍कर के संपादक प्रकाश दुबे, नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्‍द्र कालिया, प्रो. रामशरण जोशी, हिंदी के प्रसिद्ध कवि ऋतुराज प्रो. अनिल कुमार राय, आर. पी. सक्‍सेना, राकेश श्रीमाल, मनोज पांडेय सहित बड़ी संख्‍या में विद्यार्थी उपस्थित थे। 

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

अतार्किकता और फिरकापरस्ती से रहना होगा सचेत : प्रो.चमन लाल

तार्किक बात कहना आज हिम्‍मत का काम है और उसकी जरूरत भी। तार्किक बातें ही समाज को गहरे तक प्रभावित करती हैं और समाज में परिवर्तनकामी चेतना भी फैलाती हैं। आज़ादी के आंदोलन के दौरान विरोधी विचारों का भी सम्‍मान था, उस समय कटुता नहीं थी। आज अतार्किकता और फिरकापरस्‍ती का बोल-बाला है। इलाहाबाद से निकलने वाली ‘अभ्‍युदय’ और ‘भविष्‍य’ दोनों पत्रिकाएं हमें आज की चुनौतियों से टकराने की ताकत देते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि क्रांतिकारियों की भूख हड़ताल शहादत का रास्‍ता थी। हमें सचेत रहकर अतार्किकता और फिरकापरस्‍ती से मुकाबला करना होगा।
उक्‍त बातें जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के पूर्व अध्‍यक्ष, आंदोलन की क्रांतिकारी धारा के अध्‍येता एवं गोष्‍ठी के मुख्‍य वक्‍ता प्रो.चमन लाल ने महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के क्षेत्रीय केंद्र, इलाहाबाद द्वारा ‘‘कलम आज उनकी जय बोल : ‘अभ्‍युदय’ और ‘भविष्‍य’ विषय पर आयोजित गोष्‍ठी में कहीं।
बतौर वक्‍ता डॉ.सुधांशु मालवीय ने कहा कि सन् 1857 से लेकर आजादी प्राप्ति होने तक इलाहाबाद की महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है। 1877 ई. में हिंदी नवजागरण के सहयोद्धा बालकृष्‍ण भट्ट ने ‘हिंदी प्रदीप’ की शुरूआत इलाहाबाद से की। ‘स्‍वराज’ उर्दू में तीन साल में 12 संपादकों को सजा हुई। ये सभी तथ्‍य हमारी स्‍मृतियों में होने चाहिए जिससे आगे का रास्‍ता रोशन हो सके।
वरिष्‍ठ पत्रकार हिमांशु रंजन बोले, भगत सिंह के वैचारिक पक्ष को आम पाठकों के सामने मजबूती से रखना ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है। जब नवसाम्राज्‍यवाद का हमला बहुत भीषण है, पक्षधरता खत्‍म हो रही है, प्रतिकार का स्‍वर लगभग गायब है ऐसे वक्‍त हमारी क्रांतिकारी विरासत मीडिया के लिए आवश्‍यक है। आजादी के दौर में पत्रकारिता एक औजार थी। आज मीडिया समाज का अराजनीतिकरण कर रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता सीमा आजाद ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि भगत सिंह को मैंने नए सिरे से जाना। मनुष्‍य के टूटने के क्रम में ये क्रांतिकारी याद आते हैं। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता करते हुए इलाहाबाद शहर के वरिष्‍ठ नागरिक एवं स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी जियाउल हक़ ने कहा कि, आज का जो मंजर हमारे सामने है, उसके मद्देनज़र हमें अपनी तैयारी करनी चाहिए। चन्‍द्रशेखर आज़ाद की शहादत के समय मैं पांचवीं कक्षा में था। हमारे वीर क्रांतिकारियों ने मुकम्‍मल आजादी के लिए आवाज उठाई थी। कम्‍यूनल कार्ड खेलकर समाज को फिर बांटने की कोशिश की जा रही है। हमें अपनी साझी विरासत को लेकर आज बढ़ना चाहिए।
क्षेत्रीय केंद्र, इलाहाबाद के प्रभारी एवं गोष्‍ठी के संयोजक प्रो.संतोष भदौरिया ने गोष्‍ठी के आयोजन के उद्देश्‍य को स्‍पष्‍ट करते हुए कहा कि भूमंडलीकरण और चरम उपभोक्‍तावाद के दौर में जब हमारी स्‍मृतियां धूमिल हो रही हैं और नव उपनिवेशवाद के भँवर में आकर हम आर्थिक और सांस्‍कृतिक पराधीनता की ओर बढ़ रहे हैं, तब हमारे लिए राष्‍ट्रीय स्‍वाधीनता आंदोलन का पुन: स्‍मरण आवश्‍यक है क्‍योंकि वहां से प्रेरित होकर हम भारत का नवनिर्माण करने की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं। अतिथियों का स्‍वागत वरिष्‍ठ कवि नन्‍दल हितैषी ने किया।

चन्‍द्रशेखर आजाद की स्‍मृति में आयोजित इस गोष्‍ठी में प्रमुख रूप से अजित पुष्‍कल, अली जावेद, संजय श्रीवास्तव, अनीता गोपेश, नीलम शंकर, सुरेन्‍द्र राही, नन्‍दल हितैषी, अविनाश मिश्र, संध्‍या नवोदिता, झरना मालवीय, सुनीता, मीना राय, राजन, सत्‍येन्‍द्र सिंह, शिवम, विश्‍वविजय सहित तमाम युवा सा‍थी मौजूद रहे।